विश्व शांति हर उस रहनुमा का एक सपना है जो मानवता का पुजारी है. मानव इतिहास हरेक युग में अनेकों उथल-पुथल से भरी पड़ी है. मानवों ने जैसे-जैसे अपना विकास करते गया या तो उनका मुकाबला किसी दूसरे जीवों से हुआ या एक समुदाय का दूसरे समुदाय से टकराव हुआ या किसी वर्ग का दूसरे वर्ग से तकरार हुआ है. इन्हीं तकरार और टकराव के किस्सों से सम्पूर्ण मानव इतिहास भरा पड़ा है. मानवों ने अपने विकास क्रम में सर्वप्रथम गाँवों का विकास किया फिर कालांतर में हडप्पा-मोहनजोदड़ो, मेसोपोटामिया, रोमन आदि महान सभ्यताओं का निर्माण किया और अब बड़े-बड़े शहरों से सारा धरती अच्छादित हो गया है. इतना विकास होने के बावजूद मानव जाति के लिए विश्व शांति एक सपना से आगे नहीं बढ़ पाया है, हम हर दिन आतंकवाद और तृतीय विश्व युद्ध जैसे त्रासदी की परिकल्पना कर सहम जाते हैं.
विश्व शांति के लिए व्यापक प्रयास प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू किया गया. 1919 में विश्व शांति हेतु स्थापित राष्ट्रसंघ यद्यपि असफल रहा और विश्व को द्वितीय विश्वयुद्ध का जहर पीना पड़ा, लेकिन उसके बाद 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्रसंघ ने विश्व को काफी हद तक युद्धों से बचाने में अपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. लेकिन इतने व्यापक प्रयासों के बावजूद विश्व में युद्ध और साम्प्रदायिक दंगों की आशंकाएं बनी रहती हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ ने शांति की स्थापना के लिए मानवीयता के हरेक आयाम को छुने का प्रयास किया है. इस प्रयास में उसने विश्व के सभी मानव में समानता और स्वतन्त्रता की स्थापना पर अत्याधिक जोर दे रहा है और इसीलिए आर्थिक, सामाजिक, राजनितिक, लैंगिक समानता और स्वतंत्रता के लिए व्यापक अभियान चलाये जा रहे हैं. फिर भी विश्व शांति का सपना अभी सपना ही है, सभी देशों को इस दिशा में बहुत अधिक काम करने की जरुरत है और इसमें हमारा भारत भी है. भारत अब भी मुख्यतः गांव का देश है और विविद्ताओं से भरपूर एक विशाल उपमहाद्वीप के सबसे बड़े छेत्र में फैला हुआ है. यहाँ विविद्ताओं को बरकरार रखते हुए देश के सभी नागरिकों की समानता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक प्रयास करने की जरुरत है.
सन् 1947 ईस्वी में भारत की आजादी के बाद से ही भारत विश्व पटल पर विश्व-शांति के अग्रदूत देशों में रहा है और इसीलिए विश्व के अधिकतर देशों के साथ भारत का सम्बन्ध बेहतर रहा है. यद्यपि भारत के आंतरिक हालात लगभग ठीक-ठाक रहा है लेकिन समय-समय पर साम्प्रदायिक दंगों, नस्लीय अपराधों, नक्सलवाद, आतंकवाद आदि असंवैधानिक गतिविधियों से त्रस्त रहा है. भारत में मुख्यतः शहरों में साम्प्रदायिक दंगे बड़े पैमाने पर होते रहा है वहीँ गांव प्रायः नस्लीय भेदभाव और वर्तमान में नक्सलवाद से त्रस्त रहा है. इस पर भी शहर और गांव में गांव का समाज ही अधिक शांतिपूर्ण रहा है. भारत में आजादी के बाद विकास के क्रम में हजारों गाँवों का विस्थापन हुआ, परन्तु उन गांव वालों को न तो सही तरह से पुनर्वास मिला और न ही उनके जीविका का कोई बेहतर इंतजाम किया गया. अतः उन विस्थापित ग्रामीणों के परिवार जमीन का मुवावजा खतम होने के बाद रास्तों के किनारे या उद्योगों के पास झोपडियों में रहने को मजबूर हो गए और एक नयी झोपड़पट्टी संस्कृति का श्रीगणेश हुआ. फिर रोजगार और भोजन के अभाव में वहाँ की नई पीढ़ी ने असामाजिक गतिविधियों की ओर रुख किया होगा. इस तरह से एक शांतिपूर्ण गांव का साधारण सा समाज गरीब, अपराधयुक्त समाज में बदल गया. आखिर भारत ने विकास के जिस रस्ते को अपनाया उसमें समाज का अविकसित और सबसे निचले तबका को कोई हिस्सा नहीं दिया गया. इस तरह से हमारे विकास के रास्ते न खुशमय समाज की ओर जाता था और न ही विश्व शांति की ओर.
भारत के आजादी के पूर्व से ही विकास के विचार को लेकर द्वंद्व रहा. 1944-45 में एक तरफ ‘भारत के आर्थिक विकास की योजना’ (बॉम्बे प्लान) का प्रकाशन हुआ जो मुख्यतः औद्योगीकरण का मान्यता देता था वहीँ दूसरा योजना श्रीमन नारायण अग्रवाल ने गांधीवादी योजना प्रस्तुत किया, जो कृषि पर अधिक जोर देता था. इन दोनों विचारों के बीच लम्बी बहस चली और इस तरह से आजाद भारत में दोनों के सम्मिश्रित विकास मॉडल को अपनाने का प्रयास किया गया. गाँव गणराज्य के सन्दर्भ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सर्वोदय योजना विशेष प्रासंगिक है. 1950 में प्रस्तुत यह योजना गांधीवादी पद्धति पर आधारित था और आत्मनिर्भर गांवों का वकालत करता था. भारत ने कुछ गांधीवादी विचारों को मान्य करते हुए पंचवर्षीय कार्यक्रम शुरू किये लेकिन फिर भी लम्बे समय तक गाँव विकास की राह में पीछे छोड़ दिए गए. अंतत: 1992 के 73वें एवं 74वें संविधान संसोधन के द्वारा जयप्रकाश नारायण के ही विचारों को मान लिया गया. बावजूद इसके ग्राम पंचायतों को स्वराज के ऊँचाइयों को पाने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है.
हालिया नरेन्द्र मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत गांवों में व्यापक जागरूकता लाने का प्रयास किया है. उसी तरह बेटी-बचाओ बेटी- पढ़ाओ के तहत भारत में लैंगिक समानता लाने का जो प्रयास किया है वह भी सराहनीय है. लेकिन छदम राष्ट्रवाद और जातिगत, धार्मिक भेदभाव और हिंसा सरकार के नेक कामों पर काला धब्बा हैं, जो इस सरकार के कार्यकाल में कुछ अधिक ही दृष्टिगोचर होते रहे हैं. देश में महिलाओं के साथ यौन-हिंसा और बलात्कार एवं हत्या की घटनाएँ बहुत तेजी से बढ़ी हैं, भीड़ द्वारा हिंसा में भी इजाफा हुआ है, ये सभी अत्यंत चिंतनीय है. सरकार को इन चीजों को रोकने के लिए अब सख्त कदम उठाने की जरुरत है. सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिए मोब लिंचिंग पर अलग से कानून बनाने का निर्देश हाल ही में सरकार को दिए हैं. जबतक भारत और विश्व में गांवों और शहरों में सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक, शैच्छनिक भेदभाव बने रहेंगे तबतक सम्पूर्ण शांति की कामना सफल नहीं हो सकती.
भारत एक गांवों का देश है इसीलिए गाँव के विकास के लिए ग्राम पंचायतों को अधिक लोकतान्त्रिक अधिकार देने के साथ विकास में अधिक भागीदारी सुनिश्चित किया जाना चाहिए और साथ ही पारदर्शिता का कड़ाई से अनुपालन कराया जाना चाहिए. भारत में शांति की स्थापना के लिए गांवों का, गांवों में ग्रामीणों के विकास का रास्ता खोजना ही होगा. तभी हम शांति और उन्नति के रस्ते पर आगे बढ़ सकते हैं. हालाँकि सरकार इस दिश में कार्य कर रही है, एन.आर.एल.एम् (रास्ट्रीय ग्रामीण आजीविका अभियान) के तहत स्वयं सहायता समूह के माध्यम से विकास का व्यापक अभियान एक अच्छा प्रयास है. इससे ग्रामीण छेत्रों में महिलाओं में काफी जागरूकता आई है और वे स्वावलंबन के रास्ते पर आगे बढ़ रही हैं. इसी तरह सरकार को भारत के शिक्षा व्यवस्था में ग्रामीण भारत और कृषि को माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए. उच्चतर माध्यमिक स्तर पर कृषि को एक विषय के तौर पर शामिल करना चाहिए. देश ने बहुत समय तक कृषि की उपेक्षा की इससे बहुत हद तक देश की उन्नति बाधित हुई है. हमें वर्तमान सरकारों से यही उम्मीद है कि वे सामाजिक तुष्टिकरण और भेदभाव की राजनीति को छोड़कर विकास की राजनीति करेंगे।
सन्दर्भ:
भारतीय र्थव्यवस्था: रमेश कुमार
https://aajeevika.gov.in/hi/content/32cmf-rajasthan-case-studies-focus-shg-support