Thursday, April 23, 2020

पुकार


तू खिलखिला कर मुस्कुराता रहा
मेरे दर पर आशियां बनाता रहा
कई सपनों की चाह में
उम्मीदों पर कदम बढ़ाता रहा.

संवारने की मुझे तो सोच भी ना आयी तुझे
हां,  मुझे मिटाने पर जोर लगाता रहा
तू खिलखिलाकर मुस्कुराता रहा.

खैर जो भी था तो वक्त
मैंने तेरी खुशियों से सौदा कर लिया था
भूल कर तुझे सजा देने की भी सोची
मगर अपनों का औधा जो तुझे दिया था
सो तेरी गलतियों को नकारती रही
अपने जख्मों को संवारती रही.

मेरी कहकर जब जब तू पुकारता रहा 
मैं खुद को तेरे नजरों में उतारती रही
आज भी जब तू लफ्ज मेरे पढ़ रहा होगा
तुझे एक पल को भी मेरा खयाल ना आयेगा
हां मेहबूब को याद कर कयास लगा लेगा
पर धरती मां की पुकार है यह आखिर तक ना समझ पाएगा.


रिनिता रश्मी इंदिवार 
घाटशिला, पूरबी सिंहभूम

Tuesday, April 21, 2020

अम: उड़ु:

सांगिन दिशुम, कम नेलो:
मेद् तेतम् ... दुलाड़ा,
मेद् बितर रपिद् कोरे
अमदो रेतम् उकुवाकन।

मोन बांदा जिलिङ चाकर
दअः हेने-लो लेका
जपः ते हिजु गम
ओड़ो सांगिन दनङ ते रुवाड़म।




बिर अकंदलला रे
अयुम मेयङ तमः रोसोद्
सुगड़ दुरङ गमु
कुइली कुहु तान रे l 

सिरमा रे बुल तन
दअः रिमिल, नीला तानरे
मोन तङ दो दुरङ सुसुन
मेद् दअः तङ दो उबुल-डुबुल।


Samu Dhodray
(सेंड़ा सेतेङ रे चपा लेना)
Pic: www.pinterest.com
Typing: Kisan Purty

Monday, April 20, 2020

अहंकार

खुद पर अहंकार कर जो समझ रहा था 
खुद को भगवान
आज कहीं कोने में सहमा सा
दुबका पड़ा है वो इंसान
बढ़ने को आगे छूने को आसमान
जिसने बना डाले वृक्ष काटकर ऊंचे मकान
आधुनिकता के रेस में जिसने जीतने की होड़ मचाई
और कारखानों से लैश एक नई बस्ती सजाई
प्रदूषूण के सैलाब से ताजी हवा को बहा डाला
जल की ताजगी को कूड़े में उछाला
 बहुत पाने की चाह में जो दौड़ता चला गया
सच पूछो वो धरती को मौत की ओर
धकेलता चला गया.

आज उसी धरती ने पलट कर वार ऐसा दिया है
प्रकृति के द्वारा प्रहार ऐसा किया है
सच पूछो तो अब भी वक्त है
भगवान इतना भी नहीं सख्त है 
इंसान थम जा दो पल को अब इस लड़ाई में
जो वास्तविक है उसे वास्तविक ही रहने दे
वातावरण को अपनी चाल में बहने दे
न बन बाधा और खुद को भी बचा
अपने मौत के कफ़न को अपने हाथों मत सजा
बहुत कुछ खो दिया है तूने 
इसमें शक की गुंजाइश नहीं 
पर यह भी सच है 
तुझे अब और मौत की ख्वाहिश नहीं
तो संभल जा और चैन की सांस ले ले
खुदा को भी अपनी कला का अहसास दे दे.







रिनिता रश्मी इंदिवार
घाटशिला, पूरबी सिंहभूम

तूफान



Google image 
आ रहा तूफान भयंकर
अहंकार की लहर से
कहर बरपाएगी धरती पर
छिन्न-भिन्न हो जाएगी आश्रय सारी।



गहरी नींद पर सोये सारे
जागो जग के सारे प्यारो
शांत करो चित को
गरम लोहे सा तपती मन को।

ईष्र्या क्रोध संभाल अपने को
मन का मैल दूर करो
प्रेम सागर सृजन कर मन में
सोचो हृदय से अपने में
क्या जो कर रहा हूँ सब ठीक।

संसार में गरिमा मिट न जाय
सरे कलंक धो डालो
प्यार सागर के जल रे।

मद्य पान है भयावह
क्रूर भाव पैदा करता मन में
अत्याचार का साथ दे जमकर
नित हत्याएँ होता निर्मम।

आ रहा तूफान भयंकर
सोच सारे जग के जन
क्या विषम स्थिति है हमपर
प्रार्थना करो नित नमन
हे अन्तर्यामी उद्धार करो हमारा
शीश झुकाते हैं सहस्त्रों नमः
उद्धार करो इस भयंकर तूफान से।

क्रूर स्थार्थी भाव हटा दो मन से
मिटा दो सारे मैल जन मन से
'औ’ हमें अहिंसा के राह ले चल
सत्य धर्म जीवन पथ पर
ज्योतिर्मय जीवन दे।


विशराम डोडराय
बालो, खूंटी

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Thursday, April 16, 2020

मेरे गाँव के बसने की कहानी

Story By: Anjali Horo
कई सौ साल पहले की बात है, राँची के आस-पास कोई महामारी फैली हुई थी। हुलहुण्डु गाँव में भी अफरा-तफरी  का महौल था लोग अपने और अपने लोगों को बचाने का हर जतन प्रयास कर रहे थे और विकल्प तलाश रहे थे। तब हुलहुण्डु का टोंया मुण्डा खुद को और परिवार को उस महामारी से बचाने के
लिए दक्षिण की ओर चला गया। उसे तजना नदी के किनारे, घने जंगल के बीच एक जगह पसंद गई। उन्होंने बडे़ भाई के परिवार को भी बुला लिया। 
    दोनों भाईयों ने मिलकर जंगल, साफ किया और खेती के लिए जमीन बनाए। उन्होंने हुललुण्डु गाँव छोड़कर एक अलग गाँव बसाया। सर्वप्रथम टोंया मुण्डा ने इस गाँव को बसाया था इसलिए इसका नाम - टोंया टोला पड़ा। समय के साथ दोनों भाईयों का परिवार बड़ा होकर छोटे परिवारों में बाँटता गया और आज लगभग 60 परिवार हो गये। राँची-खूँटी मार्ग पर बसे मेरे गाँव में अब दूसरे गाँवों के लोग भी बस रहे हैं इससे गाँव का स्वरूप् बदल रहा है।
    अब जंगल साफ हो चुके हैं लेकिन तजना अब भी वैसे ही बहती है, हमें जीवन की दिलासा देती है जैसे सैकड़ों सालों से हमारे दादा-दादी, परदादा-परदादी लोगों को देते आयी है। आने वाले समय में शायद गाँव का स्वरूप बहुत बदल जाए पर टोंया टोला का नाम टोंया मुण्डा के नाम से बसा है यह कभी नहीं बदलेगा।
(जैसा कि मेरी माँ ने मुझे बताया)
अंजली होरो 
खूँटी
Typed by: Kisan Purty

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बतौली बोंगा

आदिवासी हमेशा किसी भी कार्य और किसी भी अवसर या त्योहार की शुरुआत से पहले अपने पूर्वजों और भगवान की पूजा करते हैं। इन दिनों वे अपने खेतों में...