तू खिलखिला कर मुस्कुराता रहा
मेरे दर पर आशियां बनाता रहा
कई सपनों की चाह में
उम्मीदों पर कदम बढ़ाता रहा.
संवारने की मुझे तो सोच भी ना आयी तुझे
हां, मुझे मिटाने पर जोर लगाता रहा
तू खिलखिलाकर मुस्कुराता रहा.
खैर जो भी था तो वक्त
मैंने तेरी खुशियों से सौदा कर लिया था
भूल कर तुझे सजा देने की भी सोची
मगर अपनों का औधा जो तुझे दिया था
सो तेरी गलतियों को नकारती रही
अपने जख्मों को संवारती रही.
मेरी कहकर जब जब तू पुकारता रहा
मैं खुद को तेरे नजरों में उतारती रही
आज भी जब तू लफ्ज मेरे पढ़ रहा होगा
तुझे एक पल को भी मेरा खयाल ना आयेगा
हां मेहबूब को याद कर कयास लगा लेगा
पर धरती मां की पुकार है यह आखिर तक ना समझ पाएगा.
रिनिता रश्मी इंदिवार
घाटशिला, पूरबी सिंहभूम




