Saturday, April 11, 2020

सिसकती साँसें

 Pic: Enjoy Horo, 'Da-a Som Fall'

पतियों में जहाँ उमंग थी
विहगों का स्वछन्द विचरण था,
वंशी की मधुर तानें थीं
राधाओं की गुंजित हँसी थी,
शोषित जिन्दगी की करवट में
साँसें सिसक रही हैं आज।

वन में मयूरों की थिरकन
झरनों की छल-छल तरंग
गायों के ठरकियों की पुकार
मन्द हो चली हैं ये झुकारें,
सूने वन में बन्दूकों की गुंज से
साँसे सिसक रही हैं आज।

खेतों की हरियाली में
हवाओं के झोंके से
झुमते फसलों की मोहक लय
खड़खड़ाती पत्तियों की अदा से
सुकून दात्री प्रकृति की,
साँसे सिसक रही हैं आज।

कट गईं सार-सेमल और पीपल
जल-थल-नभ में हुई प्रदूषण
जल हुआ जहर; थल हुई मरू
नभ में उमड़ते धूमों का बादल,
हरित गृह प्रभाव से वसुधा की
साँसे सिसक रही हैं आज।

गाँधी के ग्राम्य भारत में
औद्योगीकरण की बयार चली
विस्थापन की आंधी बही
हिंसा की महिमा हुई
गांधी के विश्व शांति की
साँसे सिसक रही हैं आज।

बिरसा की पावन धरा पर
भ्रष्टाचार की आँधी चली
राज्य लूटी लूट रही मानवता थी
हम ताकते रहे उनके तमाशे
बिरसा के ’अबुवाः राज’ की
साँसें सिसक रही हैं आज।

सामु डोडराय
राँची
11/12/2007
Typing: Kisan Purty 

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