माना कि हर रिश्ता मुकम्मल नहीं होता
हर चलते मुसाफिर का घर नहीं होता
नहीं होते जज्बात हर किसी में रिश्तेदारी निभाने की
नहीं होती यह बात हर किसी में बहुत कुछ कह जाने की,
पर दो शख्स जो हर मामलों में खरा उतरा है
कभी प्यार कर कभी रूठकर दिल से जोड़ा है
बच्चपन से जवानी के सफर में जो साथ चले
ऐसे हमसफर हमें तो कहीं ना मिले.
जो दहलीज पर पलकें बिछाकर
हमारे आने का इंतजार करते थे
हमारी सेहत से लेकर कई रिश्तों की उलझन से डरते थे
हमारी ख्वाहिशों की बंदिशों में खुशी से जुड़े रहे.
कभी खुदा कभी गुरू बनकर वो अड़े रहे
हां अहमियत बहुत कम ने ही जानी उनकी
कुर्बानी बहुत कम ने पहचानी उनकी
पर वक्त पर जो इज्जत उन्हें बटोर गया
सच पूछो वो नजरों में उतर गया.
कल अगर खामोशियों में दफन वो हो भी जाएगा
जिंदगी खोकर खुदा के घर दौलत कमाएगा
मां बाप की इज्जत जो किसी वृद्धआश्रम की जगह
अपने दिल में सजाएगा
वो ही जन्नत की सुकून को महसूस कर पाएगा।
रिनिता रश्मी इंदिवार
घाटशिला, पूरबी सिंहभूम

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