हम भी तो दीये हैं
किसी के घर आंगन के
मद्धम होती आंखों के
हमें क्यों बुझा देते हो।
हम भी तो दीये हैं
किसी के जीवन भरने इंजोत
जलने से पहले ही
हमें क्यों बुझा देते हो।
हम भी तो दीयें हैं
मंथर हवा के झोकों से
झुमते वक्त की लय में
क्या बिगाड़ा तुम्हारा जो
हमें बुझा देते हो।
हम भी तो दीये हैं
तुफानों से लड़कर
आसमान को चीरकर
जलना चाहते हैं सितारों संग
उड़ानों से पहले
हमारे पर क्यों काट देते हो ?
हम भी तो दीये हैं
किसी के घर-आंगन के
हमें क्यों बुझा देते हो ?

No comments:
Post a Comment