Thursday, April 16, 2020

मेरे गाँव के बसने की कहानी

Story By: Anjali Horo
कई सौ साल पहले की बात है, राँची के आस-पास कोई महामारी फैली हुई थी। हुलहुण्डु गाँव में भी अफरा-तफरी  का महौल था लोग अपने और अपने लोगों को बचाने का हर जतन प्रयास कर रहे थे और विकल्प तलाश रहे थे। तब हुलहुण्डु का टोंया मुण्डा खुद को और परिवार को उस महामारी से बचाने के
लिए दक्षिण की ओर चला गया। उसे तजना नदी के किनारे, घने जंगल के बीच एक जगह पसंद गई। उन्होंने बडे़ भाई के परिवार को भी बुला लिया। 
    दोनों भाईयों ने मिलकर जंगल, साफ किया और खेती के लिए जमीन बनाए। उन्होंने हुललुण्डु गाँव छोड़कर एक अलग गाँव बसाया। सर्वप्रथम टोंया मुण्डा ने इस गाँव को बसाया था इसलिए इसका नाम - टोंया टोला पड़ा। समय के साथ दोनों भाईयों का परिवार बड़ा होकर छोटे परिवारों में बाँटता गया और आज लगभग 60 परिवार हो गये। राँची-खूँटी मार्ग पर बसे मेरे गाँव में अब दूसरे गाँवों के लोग भी बस रहे हैं इससे गाँव का स्वरूप् बदल रहा है।
    अब जंगल साफ हो चुके हैं लेकिन तजना अब भी वैसे ही बहती है, हमें जीवन की दिलासा देती है जैसे सैकड़ों सालों से हमारे दादा-दादी, परदादा-परदादी लोगों को देते आयी है। आने वाले समय में शायद गाँव का स्वरूप बहुत बदल जाए पर टोंया टोला का नाम टोंया मुण्डा के नाम से बसा है यह कभी नहीं बदलेगा।
(जैसा कि मेरी माँ ने मुझे बताया)
अंजली होरो 
खूँटी
Typed by: Kisan Purty

नोट: अगर आपके पास भी कोई किस्सा है या कहानी है तो हमें लिख भेजें. इ-मेल करें या वाट्स्अप करें : samudhodray@gmail.com
Whatsapp No: 07354040116
साथ में अपना एक फोटो भेजें. हम आपके लेख, कहानी, कविता को हमारे ब्लॉग में शामिल करेंगे.

No comments:

Post a Comment

बतौली बोंगा

आदिवासी हमेशा किसी भी कार्य और किसी भी अवसर या त्योहार की शुरुआत से पहले अपने पूर्वजों और भगवान की पूजा करते हैं। इन दिनों वे अपने खेतों में...