Monday, April 20, 2020

अहंकार

खुद पर अहंकार कर जो समझ रहा था 
खुद को भगवान
आज कहीं कोने में सहमा सा
दुबका पड़ा है वो इंसान
बढ़ने को आगे छूने को आसमान
जिसने बना डाले वृक्ष काटकर ऊंचे मकान
आधुनिकता के रेस में जिसने जीतने की होड़ मचाई
और कारखानों से लैश एक नई बस्ती सजाई
प्रदूषूण के सैलाब से ताजी हवा को बहा डाला
जल की ताजगी को कूड़े में उछाला
 बहुत पाने की चाह में जो दौड़ता चला गया
सच पूछो वो धरती को मौत की ओर
धकेलता चला गया.

आज उसी धरती ने पलट कर वार ऐसा दिया है
प्रकृति के द्वारा प्रहार ऐसा किया है
सच पूछो तो अब भी वक्त है
भगवान इतना भी नहीं सख्त है 
इंसान थम जा दो पल को अब इस लड़ाई में
जो वास्तविक है उसे वास्तविक ही रहने दे
वातावरण को अपनी चाल में बहने दे
न बन बाधा और खुद को भी बचा
अपने मौत के कफ़न को अपने हाथों मत सजा
बहुत कुछ खो दिया है तूने 
इसमें शक की गुंजाइश नहीं 
पर यह भी सच है 
तुझे अब और मौत की ख्वाहिश नहीं
तो संभल जा और चैन की सांस ले ले
खुदा को भी अपनी कला का अहसास दे दे.







रिनिता रश्मी इंदिवार
घाटशिला, पूरबी सिंहभूम

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